
Hosted by Diksha Goyal · HI
"OPD Diaries — because every encounter leaves a mark."
OPD Diaries is a storytelling podcast where real moments from the doctor’s clinic turn into thought-provoking narratives. Through heartfelt encounters with patients, it captures emotions, dilemmas, and the human side of medicine — sometimes moving, sometimes ironic, always leaving listeners with a question to reflect on.

84 साल की एक महिला आज ओपीडी में आई थीं। जांच के बीच अचानक अपने पति का ज़िक्र करते हुए उनकी आँखें भर आईं। वो कुछ पल रोईं, खुद को संभाला, अल्ट्रासाउंड करवाया और चली गईं। पूरी बात बस इतनी सी थी — लेकिन उनके जाने के बाद देर तक महसूस होता रहा कि कुछ लोग उम्र के इस पड़ाव पर बीमारी से नहीं, अकेलेपन से लड़ रहे होते हैं।

त्योहारों की रौनक के बीच एक 70 साल की आंटी का प्यारा सा सवाल एक डॉक्टर को सोच में डाल देता है—क्या शादीशुदा होना काफी है, या उसे रोज़ दिखाना भी ज़रूरी है?

एक व्यस्त OPD में डरी-सहमी रज़िया और उसके पति को लगता है कि भारी bleeding के बाद उनका बच्चा नहीं बचा। अल्ट्रासाउंड मशीन पर जब धड़कन गूंजती है, तो डर आस्था में बदल जाता है। यह कहानी सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं, बल्कि उस उम्मीद की है जो डर, अज्ञान और अफवाहों के बीच भी ज़िंदा रहती है—और हमें सिखाती है कि हर bleeding अंत नहीं होती, कभी-कभी वह चमत्कार की शुरुआत भी होती है।

एक छोटे शहर की डॉक्टर की नज़र से दिखती समाज की सच्चाई — जब 15 साल की गर्भवती बच्ची अपने “पति” के साथ स्कैन करवाने आती है। यह कहानी सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि ज़मीर, ज़िम्मेदारी और उस जंग की है जो हर जागरूक इंसान को बाल विवाह के ख़िलाफ़ लड़नी चाहिए।

एक छोटा सा किस्सा, जहाँ एक महिला हमेशा परिवार के लिए खुद को पीछे रखती हैं, लेकिन एक साधारण चेकअप उन्हें याद दिला देता है—अपनी सेहत का ख्याल रखना सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार की ताक़त के लिए ज़रूरी है।

टीवीएस के नाम से सहमी अनीता जी जब आखिरकार टेस्ट के लिए तैयार हुईं, तो डर हवा हो गया और चेहरे पर मुस्कान लौट आई — डर से दोस्ती तक का ये सफ़र हुआ साकार l

एक पिता का दर्द, एक बेटी की याद… और एक छोटा-सा केक जिसने फिर से मुस्कुराना सिखा दिया और ज़िंदगी में उम्मीद का स्वाद घोल दिया।

एक अल्ट्रासाउंड के दौरान 18 साल की प्रिया का आत्मविश्वास डॉक्टर को सोचने पर मजबूर कर गया — क्या जेनज़ की ‘मैं सब जानती हूँ’ वाली सोच अहंकार है, या ये वही आग है जो आने वाले वक्त को नया रूप देगी?

जब अल्ट्रासाउंड स्क्रीन पर एक अनमैरिड लड़की की नन्हीं धड़कन सामने आई, तो डॉक्टर को न सिर्फ़ उसके दर्द बल्कि समाज के कलंक और सिस्टम की संवेदनशीलता के बीच भी रास्ता तलाशना पड़ा।

कपड़ों वाली jeans तो आसानी से बदल जाती है, लेकिन ज़िंदगी वाली genes की गुत्थी कितनी उलझी हो सकती है—ये नज़मा की कहानी बताती है।