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श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे होकर, ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन, वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर, धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं" (16.20)।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। लेकिन उपरोक्त श्लोक संकेत करते हैं कि वे आसुरी प्रवृत्ति वालों से घृणा करते हैं और इसलिए उन्हें अधम योनियों में रखते हैं।यह प्रत्यक्ष विरोधाभास हमारे इस भ्रम से उत्पन्न होता है कि श्रीकृष्ण (परमात्माका नाम व्यक्ति की आस्था के आधार पर भिन्न हो सकता है) एक व्यक्ति हैं, जबकि वे वास्तव में स्वयं अस्तित्व हैं। वे केवल उन नियमों कावर्णन कर रहे हैं जो अस्तित्व को संचालित करते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है जहाँ ऊँचाई से कूदने पर गिरना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण ने पहले इसका वर्णन इस प्रकार किया था, "व्यक्ति जिस भी प्रकार से मुझे भजते हैं, मैं उसी प्रकार से उन्हें प्राप्त होता हूँ" (4.11)। जब कोई आसुरी मार्ग अपनाता है, तो सम्भवतः समय के साथ, अस्तित्व स्वतः ही आसुरी ढंग से प्रतिक्रिया करता है।हमारा भौतिक शरीर विकास, उत्कृष्ट शिल्पकला और सुसंगति के संदर्भ में अस्तित्व की अनन्त उदारता का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह हमें जो कुछ भी दिया गया है, उसके लिए कृतज्ञ होने के बारे में है, न कि इंद्रिय तृप्ति के लिए अस्तित्व से कुछ हड़पने के लिए।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है, “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ; मैं भोगी हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ (16.14)। मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है? मैं त्याग करूँगा, मैं दान करूँगा, मैं आनंद मनाऊँगा।" इस प्रकार, आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति अज्ञानता से मोहित हो जाते हैं (16.15)। आज की दुनिया में, इसे अक्सर 'सफलता' समझ लिया जाता है।यह अहंकार की भाषा है जो दूसरों से तुलना करने से पनपती है। आसुरी व्यक्ति अहंकार से ग्रसित होता है, जो दूसरों की तुलना में अधिक धन अर्जित करने में सफलता मिलने पर, शत्रुओं के परास्त होने पर, या उन्नति के शिखर पर पहुँचने पर शासक जैसा अनुभव करता है। ऐसा होने पर अहंकार में वृद्धि होती है।तुलना इच्छाओं को प्रेरित करती है, जिसमें संचय और इंद्रिय तृप्ति की इच्छा भी शामिल हैं। लेकिन इंद्रिय तृप्ति का कोई अंत नहीं है और श्रीकृष्ण इसे अज्ञानजनित मोह कहते हैं। श्रीकृष्ण ने अज्ञान का नाश करने के लिए ज्ञान की तलवार का उपयोग करने के लिए कहा था (4.41) और कहा था कि इस संसार में ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है। समय आने पर, जिसने योग सिद्ध कर लिया है, वह इसे स्वयं में पा लेता है (4.38)। इसकी कुंजी है सबूरी (धैर्य) के साथ श्रद्धा।हमारी वर्तमान स्थिति चाहे जो भी हो, ज्ञान योग के अभ्यास से हम उपयुक्त समय में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सार यह है कि जब हम तुलना करते हैं तो स्वयं का अवलोकन करें; एक अच्छे विद्यार्थी की तरह इन प्रवृत्तियों पर प्रश्न करें (4.34), ताकि हम स्वयं को बेहतर बना सकें। श्रीकृष्ण ने पहले आश्वासन दिया था कि योग के अभ्यास में छोटे कदम भी परिणाम देते हैं (2.40)।

श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वालों के बारे में आगे कहते हैं, "यह मानते हुए कि यह सारा संसार शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है, ऐसे लोग मृत्युपर्यंत सांसारिक चिंताओं में डूबे रहते हैं (16.11)। सैकड़ों इच्छाओं, काम और क्रोध के बन्धन में बंधे हुए, वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन संचय करने का प्रयास करते हैं" (16.12)। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध स्वाभाविक है, इस प्रकार वे साथ-साथ चलते हैं। इसीलिए इंद्रियों पर नियंत्रण भगवद्गीता के प्रमुख उपदेशों में से एक है।जब कोई संचय को लक्ष्य बनाता है, तो उसकी प्रवृत्ति उसे प्राप्त करने की ओर अपनी सारी ऊर्जा लगाने की होती है। इस मार्ग पर, व्यक्ति उक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए सभी साधनों को उचित ठहराने की कोशिश करता है, चाहे वे साधन नैतिक हों या अनैतिक। इस प्रक्रिया में दूसरों को हड़पना शामिल है - यह संपत्ति या अच्छे काम का श्रेय हो सकता है; यह बाजार में हिस्सेदारी हड़पना या मन में जगह बनाना हो सकता है जिसे स्वार्थी उद्देश्यों के लिए 'दूसरों को प्रभावित करना' कहा जाता है जैसा कि सामाजिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) पर किया जाता है। श्रीकृष्ण जमाखोरी को हतोत्साहित करते हैं और जमा करने वालों को चोर कहते हैं (3.12)। वह हमें देने और लेने के प्राकृतिक चक्र का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने जल चक्र का उदाहरण दिया जिसमें वर्षा और वाष्पीकरण के निःस्वार्थ कर्म (यज्ञ) शामिल हैं।इसका मतलब अपने पेशे या कर्मों का त्याग करना नहीं है। श्रीकृष्ण ने पहले हमें कर्मों का त्याग करने के लिए नहीं, बल्कि घृणा का त्याग करने के लिए कहा था। एक बार घृणा का त्याग हो जाए, तो उसका ध्रुवीय विपरीत, यानी आसक्ति या हड़पना, स्वतः ही गायब हो जाएगा।विकास और सुधार प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। इस प्रक्रिया में, बेहतर प्रजातियाँ विकसित होती हैं; जीवन की गुणवत्ता समय के साथ बेहतर होती जाती है। सार यह है कि संचय में लिप्त होने के बजाय प्रवाह के साथ आगे बढ़ें। संचय के प्रति यह आसक्ति ही वह बन्धन है जिसे श्रीकृष्ण ने आसुरी व्यक्ति की पहचान बताया है।

श्रीकृष्ण ने अस्तित्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रकृति और पुरुष का संयोग है, जो दोनों अनादि हैं। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्नहोते हैं (13.20)। जबकि प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष उन्हें सुख और दुःख के द्वंद्वों के रूप में अनुभव करता है (13.21)। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि वह नाशवान प्रकृति से अतीत हैंऔर अविनाशी पुरुष से भी उत्तम हैं, इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम (परम पुरुष या परमात्मा) कहा जाता है (15.18)। यह पुनरावृत्ति हमें निम्नलिखित श्लोकों को समझने में मदद करेगी।श्रीकृष्ण कहते हैं, “आसुरी स्वभाव वाले लोग कर्म और अकर्म में भेद नहीं कर पाते। उनमें न तो पवित्रता होती है, न आचरण, न सत्य (16.7)। वे कहते हैं कि संसार परम सत्य से रहित है, आधारहीन है, प्रभु से रहित है।यह संसार कामवासना से (स्त्री-पुरुष के) पारस्परिक मिलन से उत्पन्नहुआ है" (16.8)। मूलतः, यह प्रकृति के स्तर पर जीवन जीना है, जहाँ कारण और प्रभाव का प्रभुत्व है; जहाँ तर्क ही हमारे अनुभव की हर चीज को परिभाषित करता है।अगला प्रश्न यह उठता है कि नाशवान प्रकृति के स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति का आचरण कैसा होगा। इस संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं, “ऐसे विचारों को धारण करके, ये पथ भ्रष्ट आत्माएँ, अल्प बुद्धि और क्रूर कर्मों के साथ, संसार के शत्रु के रूप में इसके विनाश का कारण बनती हैं(16.9)। अतृप्त कामनाओं को धारण किए, पाखंड, अभिमान और अहंकार से युक्त, मोहवश बुरे विचारों से युक्त, ये अशुद्ध संकल्प से कार्य करते हैं (16.10)।संक्षेप में, आसुरी स्वभाव वाले लोग पुरुषोत्तम को समझे बिना प्रकृति के कारण और प्रभाव के स्तर पर जीते हैं। सृष्टि के लिए नर-नारी के मिलन का रूपक तार्किक है। इसी प्रकार, हमारे आस-पास दिखाई देनेवाले कई कार्य और विचार भी इसी तार्किक श्रेणी में आते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम का शुद्ध आनंद तर्क से परे है। यह तर्क के बन्धन से बिना शर्त प्यार (निःस्वार्थ प्रेम) की यात्रा है।

श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रकृति मोक्ष प्रदान करती है;जबकि आसुरी गुण निरंतर बन्धन की नियति का कारण होते हैं”(16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं, इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने के बजाय भ्रम पैदा करेगी।फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं, जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अंदर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है, इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पाता और बंदर सुराही से बंध जाता है। हालाँकि बंदर अपनी बंद मुट्ठी को सुराही से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है, लेकिन जब तक उसे यह एहसास नहीं हो जाता कि जाल उसने खुद ही बिछाया है, तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता।विभाजन और उससे उत्पन्न तुलनाएँ; अतीत में जीना या भविष्य से अपेक्षाएँ; धन, विलासिता, शक्ति, मित्रों, शत्रुओं, काम, शराब या यहाँ तक कि दैनिक दिनचर्या से लगाव, बंदर की मुट्ठी में बंद उन मेवों की तरह हैं जो हमें बाँधते हैं। जहाँ कुछ और बनने या कुछ हड़पने की इच्छा बन्धन है, वहीं स्वयं को विलीन कर अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना मुक्ति है।जीवन हमारे सामने विभिन्न परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है, परंतु जब हम उन्हें उसी प्रकार आत्मसात करना सीख जाते हैं जैसे सागर नदियों को अपने में समाहित कर लेता है (2.70), जहाँ हमारी प्रतिक्रियाएँ उन परिस्थितियों से अप्रभावित रहती हैं; वही वास्तविक मुक्ति है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वाराबताए गए पड़ाव हमारी मुक्ति के मार्ग पर हुई प्रगति को परखने के मार्गदर्शक संकेतक बन सकते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकताहै।सबसे पहले, इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दियाथा जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखते हुए युद्ध लड़ेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह आंतरिक संतुलन या समत्व, अहिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। अक्रोध (क्रोध से मुक्ति), एक और दैवीय गुण है जो इस आंतरिक संतुलन का परिणाम है। दूसरी ओर, असंतुलन से उत्पन्न कोई भी कार्य हिंसा है।दूसरे, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दूसरों के प्रति सुख-दुःख में वैसा ही भाव रखता है जैसा वह स्वयं के लिए रखता है (6.32)। यह ईर्ष्या के बिना दूसरों के सुख को अपना सुख मानना है; यह परपीड़न या व्यंग्य के बिना दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानना है। दूसरों के प्रति ऐसी भावना अहिंसा है। निंदा भी एक प्रकार की हिंसा है जो हम झूठे और अपमानजनक बयान देकर दूसरों पर करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने निंदा न करने को एक दिव्य गुण के रूप में शामिल किया। त्याग का एक और दिव्य गुण घृणा का त्याग है (5.3)।श्रीकृष्ण ने पहले दूसरों को स्वयं में और स्वयं को दूसरों में देखने का मार्ग बताया था (6.29-6.30)। यह दर्शाता है कि हममें भी वे अवगुण हैं जिनकी हम दूसरों में आलोचना करते हैं और दूसरों में भी वे अच्छे गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं। इसे समझना ही सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सौम्यता जैसे दिव्य गुणों को प्राप्त करना है।सत्य (सत्यवादिता) का अर्थ है अनुकूल और प्रतिकूल दोनों हीपरिस्थितियों में बिना किसी शर्त के सत्यवादी होना। यह गुण भी हमारेआंतरिक संतुलन की उपज है।

भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं’ (भय का आभाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाताहै, किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है।भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह, आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वंद्वों से भली-भाँति परिचित हैं, लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही 'अभय' भी है, जोभय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है, वहीं निर्भयता उस भावना का दमन हो सकता है, हालाँकि, अभय दोनों से परे है।सबसे पहले, मनचाहा फल न मिलने पर भय और क्रोध उत्पन्न होता है। अभय का अर्थ है कर्मफल का त्याग करके, जो भी परिणाम मिले उसे ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना (2.47), और सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखना (2.38)।दूसरा, मृत्यु हमारा मूलभूत भय है जिसमें हमारी मान्यताओं, प्रतिमानों, अच्छे समय का अंत (मृत्यु) और हमारी संपत्ति की हानि (मृत्यु) भी शामिल है। अभय का अर्थ है 'अपनी मान्यताओं के विपरीत' के परिणामों को स्वीकार करना है, क्योंकि वे भी परमात्मा का ही अंश हैं। वास्तव में, कुछ संस्कृतियाँ अभय प्राप्त करने के साधन के रूप में मृत्यु के उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। श्रीकृष्ण ने परमात्मा की ओर यात्रा में अभय को पहली आवश्यकता के रूप मेंरखा है, क्योंकि सागर में नमक की गुड़िया के घुलने की तरह स्वयं को विलीनकरने के लिए, उनके भयंकर विश्वरूप का सामना करने के लिए, अभय आवश्यक है।

श्रीकृष्ण ने अंतःकरण शुद्धि (आंतरिक पवित्रता), ज्ञानयोग में दृढ़ता, दान, इंद्रियोंपर नियंत्रण, यज्ञ, स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) और सत्यनिष्ठा को कुछ दैवी गुणों के रूप में वर्णित किया है (16.1)। भगवद्गीता में एक सामान्य सूत्र इंद्रियों पर नियंत्रण है। यद्यपि इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, फिर भी वे इच्छाएँ उत्पन्न करके हमें बाँधती हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम मुक्ति के दिव्य मार्ग से भटक जाते हैं।आंतरिक शुद्धता को इससे पहले अध्यात्म कहा गया है और स्वभाव (आंतरिक प्रकृति) के रूपमें परिभाषित किया गया है (8.3)। यद्यपि सभी लोग जन्म के समय शुद्ध होते हैं, फिर भी बाद में समाज और परिवार द्वारा विभाजन के रूप में अशुद्धियाँ थोपी जाती हैं। परिणामस्वरूप, कुछलोगों के लिए मांसाहारी भोजन स्वीकार्य नहीं है, लेकिन अन्य के लिए यह स्वीकार्य है; चचेरे भाई से विवाह करना कुछ संस्कृतियों में स्वीकार्य है और अन्य में निषिद्ध है; एक ही परमात्माकी प्रार्थनाएँ बिल्कुल भिन्न हैं और कभी-कभी विरोधाभासी प्रतीत होती हैं; यह सूची अंतहीन है। शुद्धता प्राप्त करना इन विभाजनों को दूर करने के अलावा और कुछ नहीं है। श्रीकृष्णने इसे प्राप्त करने के एक साधन के रूप में स्वाध्याय का उल्लेख किया है। पहले उन्होंने हमें यज्ञ की तरह स्वाध्याय करने की सलाह दी थी (4.28) क्योंकि यज्ञ निःस्वार्थ कर्म है। आत्म-अध्ययन का उपयोग ज्ञान योग में दृढ़ता के एक अन्य दिव्य गुण के लिए भी किया जा सकता है जहाँ हम एक अच्छे विद्यार्थी की तरह खुद से प्रश्न करते रहते हैं।श्रीकृष्ण ने दान को एक और दिव्य गुण के रूप में कहा है। सबसे पहले, कोई भी संचय आसुरीस्वभाव का हिस्सा है और स्वयं को खाली करना दिव्य स्वभाव का एक हिस्सा है। दूसरे, यह दान देने की गुणवत्ता को विकसित करने के बारे में है न कि दान की मात्रा के बारे में। दान एक शब्द, समय, आश्वासन या कोई भौतिक चीज हो सकती है। यह जो भी हमारे पास है या जिसकी हम क्षमता रखते हैं उसे देने की आदत डालने के बारे में है। तीसरा, यह बदले में कुछ भी अपेक्षा किए बिना शुद्ध प्रेम है क्योंकि अपेक्षा दान को एक व्यवसाय बना देगी।

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)।एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्णने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरीपूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है।श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और6.30)।श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है।श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण में लाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं।

परमात्मा अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक अविनाशी बूंद है जो नाशवान मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सूर्य में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में भी है, उसको तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन रस से पोषित करता हूँ" (15.13)।" मैं वैश्वानर (तेज शक्ति) बनकर सभी प्राणियों के शरीर में स्थित हूँ, प्राण (श्वास) और अपान (प्रश्वास) से युक्त होकर चतुर्विध अन्न को पचाता हूँ (15.14)। मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित; और मुझसे ही स्मृति (आत्म-जागरूकता), ज्ञान और अपोहन (संदेहों का समाधान) उत्पन्न होते हैं। मैं ही समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं ही वेदान्त का रचयिता और वेदों के अर्थों को जानने वाला हूँ" (15.15)।सबसे पहले, श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सूर्य का तेज हैं और सभी जीवों को ऊर्जा से पोषित करते हैं। पौधे इसे हमारे भोजन में बदल देते हैं। अतीत का सूर्य का प्रकाश ही वह है जिसका उपयोग हम जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) केरूप में करते हैं। सूर्य का प्रकाश जल को तरल अवस्था में रखता है। इसलिए, यह हमें जीवित रहने और अस्तित्व में रहने में सक्षम बनाता है।दूसरे, श्रीकृष्ण ने मानव शरीर में होने वाली असंख्य प्रक्रियाओं को समझाने के लिए पाचन और श्वास प्रक्रिया को रूपकों के रूप में चुना। यह किसी शल्यचिकित्सक के चीरे के ठीक होने जैसा है; यह शरीर के विभिन्न अंगों और रसायनों के बीच सामंजस्य है जो इसे क्रियाशील बनाता है। विज्ञान 'कैसे' का उत्तर देने में तो कुशल है, लेकिन 'क्यों' का नहीं। 'प्रकाश कैसे कार्य करता है' की व्याख्या की गई है, लेकिन 'प्रकाश द्वैत क्यों है' जैसे प्रश्नों के उत्तर अनिश्चित छोड़ दिए हैं । इन श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ही इन 'क्यों' के मूल स्रोत हैं। हालाँकि हम 'कैसे और क्यों' के निश्चित उत्तर खोजने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन ये मूलतः उनकी लीला या दिव्य नाटक की अभिव्यक्तियाँ हैं।