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मेरा वतन वही है...!!!

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी !!!

वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ..

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी..

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है

न तख़्त ओ ताज में ने लश्कर ओ सिपाह में है

मुझे आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-नीम-शब का फिर पयाम आया

ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहीं

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं