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भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)।एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्णने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरीपूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है।श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और6.30)।श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है।श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण मेंलाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं।

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)।एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्णने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरीपूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है।श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और6.30)।श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है।श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण में लाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं।

परमात्मा अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक अविनाशी बूंद है जो नाशवान मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सूर्य में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में भी है, उसको तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन रस से पोषित करता हूँ" (15.13)।" मैं वैश्वानर (तेज शक्ति) बनकर सभी प्राणियों के शरीर में स्थित हूँ, प्राण (श्वास) और अपान (प्रश्वास) से युक्त होकर चतुर्विध अन्न को पचाता हूँ (15.14)। मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित; और मुझसे ही स्मृति (आत्म-जागरूकता), ज्ञान और अपोहन (संदेहों का समाधान) उत्पन्न होते हैं। मैं ही समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं ही वेदान्त का रचयिता और वेदों के अर्थों को जानने वाला हूँ" (15.15)।सबसे पहले, श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सूर्य का तेज हैं और सभी जीवों को ऊर्जा से पोषित करते हैं। पौधे इसे हमारे भोजन में बदल देते हैं। अतीत का सूर्य का प्रकाश ही वह है जिसका उपयोग हम जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) केरूप में करते हैं। सूर्य का प्रकाश जल को तरल अवस्था में रखता है। इसलिए, यह हमें जीवित रहने और अस्तित्व में रहने में सक्षम बनाता है।दूसरे, श्रीकृष्ण ने मानव शरीर में होने वाली असंख्य प्रक्रियाओं को समझाने के लिए पाचन और श्वास प्रक्रिया को रूपकों के रूप में चुना। यह किसी शल्यचिकित्सक के चीरे के ठीक होने जैसा है; यह शरीर के विभिन्न अंगों और रसायनों के बीच सामंजस्य है जो इसे क्रियाशील बनाता है। विज्ञान 'कैसे' का उत्तर देने में तो कुशल है, लेकिन 'क्यों' का नहीं। 'प्रकाश कैसे कार्य करता है' की व्याख्या की गई है, लेकिन 'प्रकाश द्वैत क्यों है' जैसे प्रश्नों के उत्तर अनिश्चित छोड़ दिए हैं । इन श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ही इन 'क्यों' के मूल स्रोत हैं। हालाँकि हम 'कैसे और क्यों' के निश्चित उत्तर खोजने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन ये मूलतः उनकी लीला या दिव्य नाटक की अभिव्यक्तियाँ हैं।

श्रीकृष्ण विभिन्न संदर्भों में 'सृष्टि' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म का कारण है (14.3)। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं (13.20) और प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है (13.21)।श्रीकृष्ण आगे विस्तार से बताते हैं और कहते हैं, "सृष्टि में दो प्रकार के पुरुष हैं, क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी)। नाशवान वे सभी प्राणी हैं जो भौतिक जगत में हैं। अविनाशी को कूटस्थ (आत्मा) कहते हैं (15.16)। लेकिन एक और शाश्वत सर्वोच्च सत्ता है जिसे परमात्मा कहते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त होकर, वे उनका पालन करते हैं" (15.17)। मूलतः, यह शाश्वत परमात्मा ही है जो अविनाशी आत्मा और नाशवान भौतिक जगत (प्रकृति) दोनों का पालन करता है।वर्तमान वैज्ञानिक समझ यह है कि आरंभ में केवल शुद्ध ऊर्जा ही थी। समय के साथ, कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। यह पदार्थ नाशवान है और कुछ भौतिक नियमों का पालन करता है, जिन्हें श्रीकृष्ण ने कारण और प्रभाव कहा है। यही पदार्थ जीवों के भौतिक शरीर बनाता है और इन जीवों को जीवित रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। संक्षेप में, हम अपने आस-पास जो कुछ भी देखते हैं, वह ऊर्जा और पदार्थ का परस्पर प्रभाव है।यह वर्तमान समझ उपरोक्त श्लोकों के अनुरूप है, जहाँ श्रीकृष्ण ने कहा कि वह अपने गर्भ (जिसे यहाँ प्रकृति कहा गया है) में बीज (जिसे यहाँ अविनाशी पुरुष या आत्मा कहा गया है) स्थापित करते हैं और जीवन का आरंभ होता है।श्रीकृष्ण एक आयाम और जोड़ते हुए कहते हैं कि वे प्रकृति और पुरुष दोनों से परे हैं फिर भी उन दोनों का आधार और सहारा हैं। यह स्पष्टता हमें आत्मा और परमात्मा का बोध कराती है।

श्रीकृष्ण ने जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका एक अंश देहधारी आत्मा के रूप में प्रकट होता है और इंद्रियों को आकर्षित करता है जो प्रकृति का हिस्सा हैं। यह संकेत करता है कि इच्छाएँ ही इंद्रियों को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए, देखने या सुनने की इच्छा के कारण, क्रमशःआँख या कान जैसी इंद्रियों का विकास हुआ।वे आगे देहधारी आत्मा के शरीर त्यागने और नए शरीर में प्रवेश करने की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, "जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, वैसे ही देहधारी आत्मा मन और इंद्रियों को (सूक्ष्म शरीर को) अपने साथ ले जाती है, जब वह एक पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करती है (15.8)। मोहग्रस्त लोग आत्मा को शरीर में निवास करते हुए, शरीर से प्रस्थान करते हुए या इंद्रियों के द्वारा विषयों का अनुभव करते हुए नहीं देख सकते। केवल ज्ञानचक्षु वाले देख सकते हैं (15.10)।मुक्ति के लिए प्रयत्नशील योगी परमात्मा को अपने भीतर विद्यमान देखते हैं; लेकिन अशुद्ध मन वाले अज्ञानीजन परमात्मा को अनुभव करने मेंअसमर्थ होते हैं, भले ही वे ऐसा करने के लिए संघर्ष करते हों" (15.11)। शुद्धताऔर कुछ नहीं बल्कि सुख-दुःख; लाभ-हानि; और जय-पराजय के बीच संतुलन है (2.38)।यह श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन को पहले दिए गए आश्वासन का विस्तार है कि जब कोई व्यक्ति श्रद्धा के साथ वैराग्य और अभ्यास के माध्यम से शाश्वत अवस्था के जिस बिंदु पर देह त्याग करता है, वह अपने अगले जन्म में उसी बिंदु से शुरू करेगा जहाँ से उसने पिछले जन्म में छोड़ा था (6.37-6.45)। अनिवार्य रूप से, अनासक्ति की कुल्हाड़ी के उपयोग का अनुभव अगले जन्म तक साथ रहता है।श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि प्रयास आवश्यक हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि मुक्ति (शाश्वत अवस्था) प्राप्त करने के लिए हमें मन और हृदय की शुद्धता आवश्यक है। यह परमाणु हथियार बनाने के प्रयासों के समान है, लेकिनहृदय की शुद्धता का अभाव विनाश का कारण बन सकता है। यही कारण है कि कई संस्कृतियाँ और परंपराएँ ध्यान जैसी आध्यात्मिक तकनीकों को अपनाने से पहले आंतरिक शुद्धता पर जोर देती हैं।

सृष्टि को परमात्मा की लीला या दिव्य नाटक कहा जाता है और यहाँ गंभीरता से लेने जैसा कुछ भी नहीं है। इस दिव्य नाटक में कुछ नियमों का पालन किया जाता है। श्रीकृष्ण इन नियमों की व्याख्या करते हुए कहते हैं, "इस भौतिक संसार की जीवात्माएँ मेरी शाश्वत आत्मा का केवल एक अणु अंश मात्र हैं और पाँच इंद्रियों और मन को आकर्षित करती हैं, जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं (15.7)। श्रवण, दृष्टि, स्पर्श, स्वाद, गंध की ग्राहिका इंद्रियों तथा मन को अधिष्ठान बनाकर यह जीवात्मा इंद्रिय विषयों का भोग करता है" (15.9)। श्रीकृष्ण ने पहले प्रकृति और पुरुष को अनादि कहा था। गुण और विकार प्रकृति से पैदा होते हैं (13.20)। प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने के लिए जिम्मेदार है (13.21)। साथ मिलकर ये श्लोक जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।सबसे पहले, परमात्मा का एक अंश प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान है जिसे हम आत्मा कहते हैं और इस अर्थ में, हम उससे कभी अलग नहीं होते। बस, इंद्रिय जगत का अनुभव करते हुए हम भूल जाते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं। दूसरा, इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि आत्मा इंद्रियों को क्यों आकर्षित करती है और सुख-दुःख के चक्कर में क्यों पड़ जाती है। इसलिए यह बस एक लीला है और यही जीवन है।हमारी सामान्य समझ यह है कि इन्द्रियाँ बहुत शक्तिशाली होती हैं और हमें उन पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। हालाँकि, श्रीकृष्ण एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जब वे कहते हैं कि ये इन्द्रियाँ सबसे पहले आत्मा द्वारा प्रकाशित होती हैं। एक बार जब वे अपनी इंद्रियों के विषयों से मिलती हैं, तो वे सुख और दुःख के द्वंद्वों का निर्माण करने के लिए बाध्य हो जाती हैं (2.14)। लक्ष्य इस आसक्ति को समाप्त करना और इंद्रियों का स्वामी बननाहै ताकि उनका उपयोग किसी अन्य उपकरण की तरह किया जा सके।

श्रीकृष्ण कहते हैं, "वे जो अभिमान और मोह से मुक्त हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति की बुराइयों पर विजय पा ली है, जो निरंतर अपनी आत्मा और भगवान में लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे मान और मोह रहित ज्ञानीजन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं" (15.5)।मूलतः, ये उनके धाम में पहुँचने के गुण हैं और यदि एक बार हम इनकोप्राप्त कर लेते हैं, तो हम उनके धाम में होते हैं। एक और संकेत यह है कि उनका धाम कहीं बाहर नहीं है, बल्कि अंदर ही है, जिसे खोजा जाना बाकी है।श्रीकृष्ण ने उन गुणों का वर्णन किया है जो हमें उनके धाम की यात्रा में मार्गदर्शक मील के पत्थरों के रूप में सहायता कर सकते हैं। मैत्रीपूर्ण और दयालु होना; ममत्व रहित और निर्-अहंकार; किसी भी प्राणी से द्वेष न रखना; सुख-दुःख में समभाव रखना (सम-सुख-दुःख) और क्षमाशील होना (क्षमाशील); सदैव संतुष्ट और व्याकुलता से मुक्त रहना; ईर्ष्या, भय और चिंता से मुक्त रहना; सभी कार्यों में अपेक्षाओं और स्वार्थ से मुक्त रहना (12.13 से 12.16); विनम्र और क्षमाशील होना; इंद्रिय विषयों के प्रति वैराग्य; वांछनीय और अवांछनीय परिस्थितियों के प्रति अनासक्ति और शाश्वत समभाव (13.8-13.12) इनमें सम्मिलित हैं ।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "न तो सूर्य, न ही चंद्रमा, और न ही अग्नि मेरे उस परम धाम को प्रकाशित कर सकते हैं, जहाँ जाने के बाद, कोई कभी वापस नहीं आता" (15.6)।किसी न किसी रूप में, हम सभी उनके धाम के मार्ग पर हैं क्योंकि हम सभी उस आनंद, तृप्ति और मुक्ति की खोज में हैं। हमारी सामान्य मान्यता यह है कि उनके आशीर्वाद से हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं और संपत्ति, सफलता, नाम और प्रसिद्धि के माध्यम से आनंद को अधिकतम कर सकते हैं। हालाँकि, प्रत्येक सुख के बाद दुःख अवश्य आता है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच निरंतर झूलना पड़ता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि द्वंद्वों से मुक्ति उनके धाम की पहचान है। उनके धाम तक पहुँचना कुछ और नहीं बल्किइच्छाओं का त्याग और सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से ऊपर उठना है, जो आनंदमय जीवन है।

श्रीकृष्ण ने जीवन के उल्टे वृक्ष की बात की, जहाँ मनुष्य नीचे की ओर लटकती कर्म रूपी जड़ों से बंधा हुआ है। श्रीकृष्ण हमें तुरंत इस बन्धन से मुक्त होने के लिए 'अनासक्ति की कुल्हाड़ी' का प्रयोग करने की सलाह देते हैं (15.3)।अनासक्ति भगवद्गीता के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। श्रीकृष्ण ने कईअवसरों पर इस शिक्षा का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर, हम लोगों, वस्तुओं, भावनाओं, विचारों और विश्वासों से आसक्त होते हैं। हमारी कई मान्यताएँ अवैज्ञानिक मिथकों, तर्कहीन मान्यताओं या अपुष्ट सूचनाओं पर आधारित होती हैं। एक अच्छा शिक्षार्थी बनने के लिए श्रीकृष्ण के द्वारा बताए गए 'प्रश्न पूछने' के गुण को विकसित करके, व्यक्ति उनसे अनासक्ति प्राप्त कर सकता है (4.34)। जबकि हमें अनासक्ति के बारे में बताया जाता है, हम विरक्ति यायहाँ तक कि घृणा की ओर आकर्षित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने हमेंस्पष्ट रूप से घृणा त्यागने के लिए कहा है।हमें आसक्ति से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल लगता है क्योंकि यह लंबे समय से हमारे द्वारा पोषित की गई है और यह हमारा एक हिस्सा बन जाती है। इसका मूल संदेश यह है कि आसक्ति को त्यागना है, लेकिन वस्तुओं और संबंधों को तोड़ना नहीं है। वास्तव में, इसका अर्थ है किसी भी परिस्थिति में आसक्ति के बिना अपना सर्वश्रेष्ठ करना।श्रीकृष्ण कहते हैं, "इस अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वास्तविक स्वरूप, इसका आदि, इसका अंत और इसकी निरंतरता के रूप - इनमें से कुछ भी सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता। अनासक्ति की प्रबल कुल्हाड़ी से इसे काटकर इस वृक्ष के मूल को खोजना चाहिए, जो कि परमेश्वर हैं, जिनसे बहुत समय पहले ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ प्रवाहित हुई थीं। उनकी शरण में आने पर, मनुष्य इससंसार में पुनः नहीं लौटेगा" (15.3 और 15.4)।एक बार जब कोई अनासक्ति की कुल्हाड़ी से लैस हो जाता है, तो वृक्ष के मूल अर्थात् परमात्मा की खोज शुरू हो जाती है।

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का प्रारम्भ उल्टे जीवन वृक्ष का वर्णन करते हुए कहते हैं, "ज्ञानी लोग एक शाश्वत अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की चर्चा करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं, और जिसके पत्ते वेदों के मंत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है (15.1)। तीनों गुणों से पोषित, इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे की ओर फैली हुई हैं; इसकी कोमल कोपलें इंद्रिय विषय हैं; इसकी जड़ें नीचे की ओर फैली हुई हैं, जो मनुष्यों को कर्म से बाँधती हैं" (15.2)।सबसे पहले, जो लोग इस वृक्ष को जानते हैं, उन्हें वेदों का ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान। एक संभावित व्याख्या यह है कि वेदों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उन्हें पढ़ने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। एक बार जब इस जीवन-वृक्ष को अस्तित्वगत स्तर पर समझ लिया जाता है, तो वही ज्ञान प्राप्त हो जाता है।दूसरे, अश्वत्थ का अर्थ है ‘वह जो कल भी एक सा नहीं रहता।’ लेकिन वृक्षको शाश्वत बताया गया है। यह कुछ विरोधाभासी प्रतीत होता है, जैसे प्रकाश का तरंग–कण द्वैत (wave–particle duality) का विरोधाभास। मूलतः, वृक्ष शाश्वत और परिवर्तन दोनों का मिश्रण है। आगे के श्लोकों में और स्पष्टता आएगी।अंततः, यह रूपक हमें अपने आस-पास की दुनिया के बारे में अपनीसोच को बदलने में मदद करेगा। हमारे विचार में प्रगति का अर्थ है शक्ति और प्रसिद्धि के मामले में कुछ उच्चतर प्राप्त करना; अधिक संपत्ति प्राप्त करना।हम आध्यात्मिक प्रगति के बारे में भी ऐसा ही सोचते हैं। यह रूपक इंगित करता है कि उच्च आध्यात्मिक प्रगति का अर्थ है जड़ों की ओर लौटना। यह त्यागने के बारे में है न कि प्राप्त करने के बारे में; यह हमारे जीवन के दौरान बने तंत्रिका प्रतिरूपों को तोड़ने जैसा है; यह एक नमक की गुड़िया की तरह है जो समुद्र के साथ एक होने के लिए खुद को विलीन कर रही है। मूलतः, हमें उस धूल को हटाना है जो हमने लंबे समय से जमा की है।

भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय को ‘गुण त्रय विभाग योग’ कहा जाता है, जिसमे गुणों और गुणातीत की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन गुणों से परे जाने का उपाय बताते हुए करते हैं और कहते हैं, "जो लोग अनन्य (अव्यभिचारेण) भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्म (गुणातीत) के स्तर पर पहुँच जाते हैं (14.26), क्योंकि मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनंदस्वरूप है” (14.27)। श्रीकृष्ण 'व्यभिचारेण' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है अनेक इच्छाएँ। 'अव्यभिचारेण भक्ति' एकनिष्ठ भक्ति है। इसी संदर्भ में, श्रीकृष्ण ने इसे इंगित करने के लिए 'अवेश्य' का प्रयोग किया (12.2)। मूलतः, यह अनेक मनों से परे होकर ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति है जो हमें गुणातीत बना देगा।सबसे पहले, गुणातीत यह समझकर कर्तापन का भाव त्याग देता है कि किसी भी कर्म का कोई कर्ता नहीं है और सभी कर्म विभिन्न गुणों के परस्पर प्रक्रिया का परिणाम हैं।दूसरे, उसे यह बोध हो जाता है कि दूसरे भी अपने द्वारा किए गए किसी भी कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। परिणामस्वरूप, वह सम्मान या अपमान से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि दोनों ही गुणों की परस्पर क्रिया है, जिसका परिणाम शत्रुता का त्याग है।अंततः, उसे यह बोध होता है कि सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सुखद और अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं। अतः, वह अब ऐसीपरिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार, वह प्रशंसा और आलोचना से भी प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि ये गुणों के कारणहोते हैं। गुणातीत की यह अवस्था आनंद की अवस्था है और यही हम सभी के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।