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श्रीकृष्ण गुणातीत के आचरण के बारे में बताते हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर उठ गए हैं और कहते हैं, “वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं;जो आत्मा में स्थित हैं; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान मानते हैं; जो सुखद और अप्रिय घटनाओं में एक समान रहते हैं; जो बुद्धिमान हैं, जो निन्दा और प्रशंसा दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं; जो सम्मान और अपमान में एक समान रहते हैं; जो मित्र और शत्रु दोनों के साथ समान व्यवहार करते हैं; और जिन्होंने कर्तापन के सभी मोहों को त्याग दिया है - वे तीनोंगुणों से ऊपर उठ गए हैं" (14.24 और 14.25)। संकेत यह है कि गुणातीत समदर्शी होने के साथ-साथ द्वन्द्वातीत भी है। जब इन्द्रियाँ इंद्रिय विषयों से मिलती हैं तो हमारे अंदर सुख और दुःख के द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। श्रीकृष्ण ने पहले सलाह दी थी कि इन्हें अनदेखा करना सीखें क्योंकि ये क्षणिक हैं (2.14)। जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि द्वंद्व न केवल क्षणिक होते हैं बल्कि समय के साथ अपना स्वभाव भी बदलते हैं। विवाह का सुख तलाक के दुःख में बदल सकता है; एक मित्र शत्रु में बदल सकता है। जब हम अच्छे और बुरे; सुखद और अप्रिय द्वंद्वों का सामना करते हैं, उस समय समभाव बनाए रखना है। जबकि घटनाएं प्रकृति में घटित होती हैं, हम उन्हें सुखद या दुःखद परिस्थितियों के रूप में व्याख्यायित करते हैं। हम दूसरों के शब्दों को प्रशंसा या आलोचना के रूप में ग्रहण करते हैं, और परिवार तथा कार्यस्थल में अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रशंसा और आलोचना - दोनों को साधन के रूप में उपयोग करते हैं। मूलतः, यह अपनी व्याख्याओं और मान्यताओं को त्यागने के बारे में है।भगवद्गीता प्राथमिक कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पाठ्यपुस्तक है। ये श्लोक शुरुआती बच्चों के लिए भी समझने में बहुत आसान हैं। परंतु मूल बात यह है कि हम प्रत्येक परिस्थिति का विश्लेषण करके, और उन पूर्व अनुभवों पर मनन करके - जब हम प्रशंसा या आलोचना, सम्मान या अपमान से प्रभावित हुए थे - इन अंतर्दृष्टियों को अस्तित्वगत स्तर पर आत्मसात करें। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक परिस्थिति को श्रीकृष्ण की लीला के रूप में देखना चाहिए।

यह समझाने के बाद कि सत्व, रजस् और तमस् नामक तीन गुण आत्मा को भौतिक शरीर से बांधते हैं, श्रीकृष्ण इन गुणों को पार करके गुणातीत या निर्गुण बनने के लिए कहते हैं। अर्जुन ने तुरंत पूछा कि इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण क्या हैं, उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनोंगुणों से कैसे परे जाता है (14.21)।श्रीकृष्ण कहते हैं, "तीनों गुणों से अतीत मनुष्य सत्वगुण से उत्पन्न प्रकाश, रजोगुण से उत्पन्न कर्म, और तमोगुण से उत्पन्न मोह के उपस्थित होने पर उनसे घृणा नहीं करते और अनुपस्थित होने पर उनकी लालसा नहीं करते (14.22)। वे उदासीन रहते हैं, गुणों से विचलित नहीं होते; वे यह जानकर कि सृष्टि में केवल गुण ही कार्यरत हैं, आत्मा में दृढ़ और केंद्रित रहते हैं” (14.23)। यह न तो गुणों की किसी भी अभिव्यक्ति के साथ लगाव (राग या आसक्ति) है और न ही वैराग्य (विराग या विरक्ति) है। श्रीकृष्ण ने ऐसी शाश्वत स्थिति का वर्णन करने के लिए वीतराग या अनासक्ति का उपयोग किया था। दूसरे, ऐसीपरिस्थिति में, श्रीकृष्ण ने इससे पहले हमें घृणा का त्याग करने की सलाह दी थी, लेकिन कर्म का नहीं। तीसरा, यह गुणों को अपना दास बनाने के बारे में है। जब हमें सोने की आवश्यकता हो, तो तमोगुण का आह्वान करें; जब हमें कोई कार्य करना हो, तो रजोगुण का उपयोग करें; सीखने के लिए सत्वगुण का प्रयोग करें। यह दासता की अवस्था से गुणों के प्रभुत्व की ओर बढ़ना है।उस अवस्था में, व्यक्ति को यह बोध होता है कि इन तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है। इन तीनों के बीच की परस्पर क्रिया ही कर्म का कारण बनती है,लेकिन यह हमारे या किसी और के कारण नहीं होता।एक मार्ग है कर्म को कर्मफल से अलग करना, यह समझकर कि कर्मफल कई कारकों पर निर्भर करता है। दूसरा है कर्ता को कर्म से अलग करना,यह समझकर कि तीनों गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। दोनों ही मार्ग निर्-अहंकार (मैं कर्ता हूँ की भावना से मुक्ति) की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं में केंद्रित होता है और श्रीकृष्ण ने इसे आत्मरमण या नित्यतृप्त (सदैवसंतुष्ट) कहा है।

పరమాత్ముని రూపంలో ఉన్న శ్రీకృష్ణుడు, "సకల ప్రాణులయందును ఆత్మరూపముననున్న నన్ను (వాసుదేవుని) చూచుపురుషునకు, అట్లే ప్రాణులన్నింటిని నాయందు అంతర్గతములుగా ఉన్నట్లు చూచువానికి నేనుఅదృశ్యుడుని కాను, అతడును నాకు అదృశ్యుడు కాడు" అనిచెప్పారు (6.30). ఈ శ్లోకం భక్తి యోగానికి పునాది, ఇక్కడఅభ్యాసకులు ప్రతిచోటా మరియు ప్రతి పరిస్థితిలోనూ పరమాత్మను దర్శించగలుగుతారు.'అంతా అయనే' అనే మంత్రంలో, 'అంతా' అనేదిఒక వ్యక్తి లేదా వస్తువు లేదా పరిస్థితి కావచ్చు. ఈ మంత్రాన్ని పునరావృతం చేస్తూ, ఈ విషయము గురించి లోతైన అవగాహన కలిగితే అది అద్భుతాలు సృష్టిస్తుంది. ఈ విషయాన్ని గుర్తించిన తర్వాత మిత్రుడులోనైనా, శత్రువులోనైనా, సహాయం చేసినవారిలోను, కష్టాన్ని కలిగించినవారిలోను, పొగడ్తలోనూ, విమర్శలోనూ, బంగారంలోనూ, రాయిలోనూ లేదా అనుకూల ప్రతికూల పరిస్థితుల్లోనూ, సంతోషంలోనూ, ఆందోళనలోనూ,సంతృప్తిలోనూ, దు:ఖంలోనూ, జయాపజయాల్లోనూ పరమాత్మను చూడగలుగుతాము. ఒక్క మాటలో చెప్పాలంటే అన్నిపరస్పర విరుద్ధ అంశాలలో మనము పరమాత్మను దర్శించుకోగలుగుతాము.భక్తులు నన్ను సేవించిన రీతికి అనుగుణంగా నేను వారిని అనుగ్రహిస్తాను (4.11), నాకు అప్రియుడుకాని, ప్రియుడుకాని ఎవరూ లేరు (9.29) అని శ్రీకృష్ణుడు అంతకుముందు చెప్పారు.కానీ, "ప్రాణులన్నింటిని నాయుందు అంతర్గతములుగా ఉన్నట్లు చూచువానికి నేను అదృశ్యుడని కాను, అతడును నాకు అదృశ్యుడు కాడు" (6.30) అనేది మనలోని విభజన యొక్క కొలమానాన్ని, పరమాత్మ నుండి మన దూరాన్ని సూచిస్తుంది అంతేకాని పరమాత్మ ఎవరినీ ద్వేషిస్తూన్నాడని కాదు.‘‘పరమాత్మను చేరుకున్నవాడు, సకల చరాచర జీవరాశిలలోనూనన్నే చూడగలిగినవాడు ఎటువంటి జీవనాన్ని కొనసాగించినా అతడి భక్తి శ్రద్దల్లో నేను కొలువుదీరి ఉంటాను’’ అని శ్రీకృష్ణుడు భరోసా ఇస్తున్నారు (6.31). దీని అర్ధం ఏమిటంటే మనం ఏమి చేస్తున్నాము, మన దగ్గర ఏమి ఉన్నది అన్నది ముఖ్యం కాదు. సకల చరాచర జీవరాశిలలో ఆ పరమాత్మను చూడటమే ముఖ్యం. భౌతిక ప్రపంచం సుఖదు:ఖాలనే పరస్పర విరుద్ధ అంశాలతో కూడుకుని ఉంటుంది. మన జీవన విధానం సంపన్న జీవితముఅయిననూ, కష్టాల జీవితము అయిననూ మనలను సుఖదు:ఖాలనే భావనలు ఆవహిస్తూ ఉంటాయి. కోపం, ఉద్వేగం,ఉద్రిక్తతలకు లోనవుతూనే ఉంటాము. అందుకే శ్రీకృష్ణుడు మనల్ని ఏకత్వములో స్థిరపడమని తద్వారా ఈ పరస్పర విరుద్ధ భానవల నుండి విముక్తులవమని బోధిస్తున్నారు.

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब बुद्धिमान व्यक्ति (द्रष्टा) यह देखते हैं कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है और जो तीनों गुणों से अत्यन्त परे मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करते हैं (14.19)। शरीर से संबद्ध तीन गुणों को पार करके गुणातीत होकर शरीरधारी जीव (देही) जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर अमरत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है” (14.20)। मूलतः, तीनों गुण ही कर्म के कर्ता या वास्तविक कर्ता हैं।मृत्यु को समझने का एक तरीका यह है कि जब शरीर किसी कारण से स्वचालितता बनाए रखने में असमर्थ हो जाता है, तो आत्मा का भौतिक शरीर से वियोग हो जाता है। इसके बाद, अमर आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है और यह चक्र चलता रहता है। इससे यह विश्वास उत्पन्न होता है कि हमारे जीवन के अकथनीय बुरे दौर पिछले जन्मों के बुरे कर्मों, पापों याअभिशापों का परिणाम हैं, और अच्छे दौर पिछले जन्मों के पुण्य कर्म हैं। आध्यात्मिक ग्रंथों में भी इसी प्रकार व्याख्या की गई है।दूसरे प्रकार की मृत्यु आत्मा का भौतिक शरीर से अलग होना है, जबकि शरीर अभी भी सक्षम और क्रियाशील है। इसे मोक्ष (जीवन मुक्ति) या आत्मज्ञान कहते हैं। यह वह अवस्था है जहाँ गुणों में आत्मा को भौतिक शरीर से बाँधनेकी क्षमता नहीं रह जाती। श्रीकृष्ण इस अवस्था को गुणों से परे होना कहते हैं और कहते हैं कि ऐसे लोग ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं। वे दुःखों से मुक्त हो जाते हैं और अमर हो जाते हैं।ये श्लोक स्पष्ट करते हैं कि कोई भी गुण न तो निम्न है और न ही उच्च। ये प्रकृति के गुण हैं जिनकी अलग-अलग विशेषताएँ हैं, लेकिन ये सभी आत्मा को शरीर से बांधते हैं। सार सभी गुणों से परे जाने का है। गुणातीत होना स्वस्थ होने के समान है, जबकि किसी भी गुण के प्रभाव में होना रोग से ग्रस्त होने के समान है। एक और निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति किसी भी गुण से ऊपर उठकर गुणातीत की स्थिति में पहुँच सकता है। गुणों में कोई पदानुक्रम नहीं है, इसलिए हमें किसी क्रम का पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

It is said that creation is just a Leela or play and some rules are framed to make it interesting. In the game of football, if the size of the goalpost is too small or too big, the interest in the game will diminish. Similarly, death follows birth; division or separation are some such interesting rules of this creation that helped in the evolution of complex life forms like us. The division is at an individual level as well as at the societal levels which are based on race, religion, caste, economic status etc. and were imprinted on us at an early stages of life. The game is to transcend them and the Bhagavad Gita is a guide to help us transcend these divisions. One such technique is the devotion to swa-karma (one's deed or duty). In that context, Krishna says, "With devotion to swa-karma one attains siddhi (perfection or freedom) as this devotion is nothing but worshipping HIM from whom all beings rise and by whom all this is pervaded" (18.45-18.46). It's about continuously learning if we enjoy learning without getting distracted by the riches or power of others. If we enjoy service, then it is continuing the same without worrying about how others look at it. Essentially, we should keep doing what we are doing to the best of our abilities. It should be done by dropping hatred; without getting trapped into the alluringly described karmas of others; without attachment to our past regrets and expectations from the future. This devotion to swa-karma is nothing but worshipping HIM. That's why Krishna in the oft-quoted verse (2.47) said that we have right over our karma but not on karma-phal (fruits of action) because each of our karma has the potential to make us attain siddhi.